UTTAR PRADESH HISTORY (उत्तर प्रदेश प्राचीन इतिहास महत्वपूर्ण बिन्दु )
उत्तर
प्रदेश का प्राचीन काल इतिहास (महत्वपूर्ण बिन्दु )
- प्राचीन काल में गंगा के मैदान में स्थित उत्तर प्रदेश का
क्षेत्र 'मध्य देश'
कहलाता था। मध्य देश (आधुनिक उ.प्र.) में कुरु, पांचाल, काशी, कोशल, शूरसेन, चेदि, वत्स तथा मल्ल
महाजनपद स्थापित थे। उत्तर वैदिक संस्कृति का मुख्य केंद्र मध्य देश था।
- · उत्तर प्रदेश में ताम्र-पाषाणिक संस्कृति के साक्ष्य मेरठ और सहारनपुर से प्राप्त हुए हैं।
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उत्तर
प्रदेश में ताम्र-कांस्य संस्कृति के साक्ष्य आलमगीरपुर (मेरठ, हिंडन नदी), बडागांव
एवं हुलास (दोनों सहारनपुर) से प्राप्त होते हैं।
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उत्तर
प्रदेश में उत्तरवैदिक संस्कृति के 'उत्तरी काले चमकीले पात्र (NBPW)' अवशेष के रूप में
पाए गए हैं।
- · उत्तर प्रदेश में पुरा-पाषाणकालीन सभ्यता के साक्ष्य सोनभद्र, मिर्जापुर तथा प्रयागराज के बेलन घाटी, सोनभद्र के सिंगरौली घाटी तथा चंदौली के चकिया नामक पुरास्थलों से प्राप्त हुए हैं।
- · बेलन नदी घाटी के पुरास्थलों की खोज एवं खुदाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.आर. शर्मा के निर्देशन में कराई गई।
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बेलन
घाटी के 'लोहदानाला'
नामक पुरास्थल से पाषाण उपकरणों के साथ-साथ एक अस्थि-निर्मित मातृ
देवी की प्रतिमा भी प्राप्त हुई है।
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पुरा-पाषाणकालीन
सभ्यता के प्रायः सभी उपकरण क्वार्टजाइट पत्थरों से निर्मित हैं। इन स्थलों के
साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इन्हें आग, कृषि कार्य, गृह
निर्माण आदि का ज्ञान नहीं था, जबकि कुछ मात्रा में पशुपालन
से परिचित होने के साक्ष्य मिलते हैं।
- मध्य-पाषाणकालीन मानव अस्थि-पंजर के कुछ अवशेष प्रतापगढ़ के सराय नाहर राय तथा महदहा नामक स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
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सराय
नाहर राय से 14 शवाधान मिले हैं, जिनमें मृतक का सिर पश्चिम दिशा की ओर है। सराय नाहर से 8 गर्त चूल्हे (Pit
hearths) भी प्राप्त हुए हैं।
- o प्रयागराज की मेजा तहसील के चोपानी मांडो पुरास्थल से झोपड़ियों एवं मिट्टी के बर्तनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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उत्तर
प्रदेश के महदहा पुरास्थल से अन्य उपकरणों के साथ-साथ सिल-लोढ़े, गर्त चूल्हे, शवाधान,
अस्थि एवं आवास के साक्ष्य मिले हैं।
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दमदमा
(प्रतापगढ़ जिला) पुरास्थल से हड्डी एवं सींग के उपकरण व आभूषण, गर्त चूल्हे तथा 41 शवाधान मिले हैं।
- नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम
कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है।
यहां से 9000 ई.पू. से 8000 ई.पू. के मध्य के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए है।उल्लेखनीय
है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला
स्थल मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित; यहां से 7000 ई.पू. के गेहूं के साक्ष्य
मिले हैं), जबकि प्राचीनतम चावल के साक्ष्य वाला स्थल
कोलडिहवा (प्रयागराज जिले में बेलन नदी के तट पर स्थित; यहां
से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था।
- · आलमगीरपुर से हड़प्पाकालीन वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। यह हड़प्पा सभ्यता के पूर्वी विस्तार को प्रकट करता है। यहां से कपास उपजाने के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।
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महाजनपदों में से 8 महाजनपद मध्य देश (आधुनिक उ.प्र.) में स्थित थे, जिनके नाम थे-कुरु, पांचाल,
काशी, कोशल, शूरसेन,
चेदि, वत्स और मल्ल।
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कोशल
महाजनपद अवध क्षेत्र में स्थापित था, जिसमें उत्तरी कोशल की राजधानी साकेत (अयोध्या) और दक्षिणी कोशल की
राजधानी श्रावस्ती (श्रावस्ती जिले में सहेत-महेत) थी।
- · शतपथ ब्राह्मण में कोशल (अवध) का उल्लेख हुआ है।
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कुरु
महाजनपद मेरठ से दिल्ली तक विस्तृत था, जिसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर थी।
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पांचाल महाजनपद बरेली, बदायूं और फर्रुखाबाद क्षेत्र में स्थित था। पांचाल महाजनपद के उत्तरी भाग
की राजधानी अहिच्छत्र एवं दक्षिणी भाग की राजधानी काम्पिल्य थी।
- · वर्तमान मथुरा के समीपवर्ती क्षेत्र में स्थित शूरसेन महाजनपद की राजधानी मथुरा थी।
- · वत्स महाजनपद (प्रयागराज के समीपवर्ती क्षेत्र में स्थित) की राजधानी कोसम (वर्तमान कौशांबी क्षेत्र) थी।
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दूसरी-तीसरी
शताब्दी में कौशांबी मघों की राजधानी थी। इस काल में कौशांबी ने राजनीतिक एवं
आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। इसे 'आद्य-नगरीय स्थल' भी
कहा जाता है।
- · कौशांबी थेर पंथ का प्रमुख केंद्र भी था। इस नगर को हूण नेता तोरमाण ने काफी क्षति पहुंचाई थी।
- · मल्ल महाजनपद (देवरिया-गोरखपुर क्षेत्र) की राजधानी कुशीनगर (कसिया) तथा पावा (पडरौना) थी।
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कुशीनगर
की विस्तृत जानकारी दिव्यावदान, दीघनिकाय, कनिष्क के सिक्कों तथा फाह्यान एवं
ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से मिलती है।
- · कुशीनगर पर हूणों के आक्रमण के भी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। कुशीनगर में 483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में गौतम बुद्ध को महापरिनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी।
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कालसी
(वर्तमान उत्तराखंड) से अशोक का 14वां शिलालेख प्राप्त हुआ है। यहां से संस्कृत
पदों से उत्कीर्ण ईंटों की एक वेदी मिली है, जो तृतीय शती ई. के शासक शीलवर्मन के अश्वमेध यज्ञ स्थल का
साक्ष्य है।
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गौतम बुद्ध का अधिकांश संन्यासी जीवन उत्तर
प्रदेश में ही व्यतीत हुआ था। इसी कारण उत्तर प्रदेश को 'बौद्ध धर्म का पालना' कहा
जाता है।
- ➡ बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण तीनों
वैशाख पूर्णिमा को ही हुए। इसीलिए बौद्ध धर्म में वैशाख पूर्णिमा को महत्वपूर्ण
स्थान प्राप्त है।
- Ø
गौतम
बुद्ध ने सर्वाधिक काल कोशल राज्य में व्यतीत किए थे। बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय' तथा
जैन ग्रंथ 'भगवतीसूत्र' से 16
महाजनपदों का साक्ष्य प्राप्त होता है।
- Ø चेदि महाजनपद की राजधानी शुक्तिमती या सोत्थिवती (बांदा के समीप) थी।
- Ø अयोध्या अभिलेख पुष्यमित्र (शुंग शासक) के अयोध्या के राज्यपाल धनदेव का है। इससे पता चलता है कि पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किए थे।
- Ø
उत्तर
वैदिक युग से संबद्ध स्थल अतरंजीखेड़ा (एटा जिले में स्थित) से गैरिक मृद्भांड तथा
कृष्ण लोहित मृद्भांड परंपरा (1450-1200 ई.पू.), चित्रित धूसर पात्र परंपरा (1200-600
ई.पू.), उत्तरी काली चमकीली पात्र परंपरा (600-50 ई.पू.) की
संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- Ø
अतरंजीखेड़ा
से 1000 ई.पू. के लौह प्रयोग, धान की खेती, वृत्ताकार अग्निकुंड एवं गैरिक तथा
कृष्ण लोहित मृद्भांड के साक्ष्य प्राप्त हुए है।
- Ø
अतरंजीखेड़ा
से शुंगों, कुषाणों
तथा गुप्त शासकों से संबद्ध अवशेष प्राप्त हुए है।
- Ø अयोध्या का प्राचीन नाम अयाज्सा था।
- Ø
बौद्ध
परंपरा के अनुसार, अशोक ने
एक स्तूप का निर्माण अयोध्या में कराया था।
- Ø
जैन
ग्रंथों के अनुसार, आदिनाथ
सहित पांच तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या थी।
- Ø
अहिच्छत्र
से 'मित्र' उपाधि वाले राजाओं के सिक्के (200-300 ई.) प्राप्त हुए हैं।
- Ø अहिच्छत्र के शासक अच्युत को गुप्त नरेश समुद्रगुप्त ने पराजित किया था।
- Ø
अहिच्छत्र
से गुप्तकालीन 'यमुना'
की एक मूर्ति प्राप्त हुई है।
- Ø
प्राचीन
काल में कन्नौज 'कान्यकुब्ज'
के नाम से प्रसिद्ध था, जहांसे पहली बस्ती के
साक्ष्य उत्तरी काले पॉलिशदार मृद्भांड काल से कुषाण युग तक के प्राप्त हुए हैं।
- Ø
पुष्यभूति
शासक हर्षवर्द्धन के काल (606-647 ई.) में कन्नौज नगर 'महोदयश्री' अथवा 'महोदय नगर' भी कहलाता था। विष्णु-धर्मोत्तर पुराण
में कन्नौज को 'महोदय' बताया गया है।
- Ø
कन्नौज
पर आधिपत्य के लिए गुर्जर प्रतिहारों, पालों एवं राष्ट्रकूटों के मध्य दीर्घकालीन त्रिकोणीय संघर्ष हुआ था। सर्वाधिक
समय तक कन्नौज पर गुर्जर प्रतिहारों ने शासन किया था।
- Ø 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया था।
- Ø
बौद्ध
काल में कपिलवस्तु (सिद्धार्थ नगर जिले के पिपरहवा से साम्य) शाक्य गणराज्य की
राजधानी थी। कपिल ऋषि के वास (स्थान) से इस स्थल का नाम 'कपिलवस्तु' पड़ा था।
- Ø यह श्रावस्ती-वाराणसी मार्ग तथा वैशाली-पुरुषपुर मार्ग का केंद्र स्थल था।
- Ø काम्पिल्य (बदायूं एवं फर्रुखाबाद के मध्य स्थित) प्राचीन काल में शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र रहा था।
- Ø अहरौरा (मिर्जापुर) से अशोक का लघु शिलालेख तथा सारनाथ (वाराणसी) एवं कौशांबी (प्रयागराज के समीप) से लघु स्तंभ-लेख मिला है।
- Ø
अशोक
की राजकीय घोषणाएं जिन स्तंभों पर उत्कीर्ण हैं, उन्हें 'लघु
स्तंभ-लेख' कहा जाता है।
- सांची एवं सारनाथ के लघु स्तंभ-लेख में अशोक अपने
महामात्रों को संघ भेद रोकने का आदेश देता है। प्रयाग स्तंभ पर अशोक की रानी
करुवाकी द्वारा दान दिए जाने का उल्लेख है। इसे 'रानी का अभिलेख' भी
कहा गया है।
➡ सोहगौरा ताम्रलेख
(गोरखपुर) - मौर्य काल का यह ताम्र लेख उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जनपद से मिला है।
इस ताम्र लेख से यह पता चलता है कि मौर्य काल में अकाल की स्थिति में जनता को अनाज
का वितरण किया जाता था।
उ.प्र. के महत्वपूर्ण जैन तीर्थ-स्थल
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जैन
धर्म के पांच तीर्थंकरों- प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ, द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजितनाथ, चतुर्थ तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ, पंचम तीर्थंकर
भगवान सुमतिनाथ तथा चौदहवें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ का जन्म स्थल अयोध्या था।सप्तम
तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ एवं तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जन्म स्थल
काशी (वाराणसी) था।
- o कौशांबी जनपद का ग्राम पभोसा छठें तीर्थंकर भगवान पद्म प्रभु से संबंधित था।
- o श्रावस्ती तृतीय तीर्थंकर भगवान संभवनाथ एवं विख्यात शोभनाथ मंदिर से संबंधित स्थल था।
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'देवताओं
के किले' के रूप में विख्यात, प्राचीन
जैन मूर्तियों एवं शिल्प-कला हेतु सुप्रसिद्ध स्थल देवगढ़ है।
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महोबा 'गोखर पहाड़' पर
चट्टानों को काटकर निर्मित 24 तीर्थंकरों की प्रतिमाओं हेतु विख्यात है।
- o काकंडी (देवरिया) 9वें तीर्थंकर भगवान सुविधिनाथ (पुष्पदंत) का निवास-स्थल था।
- o प्रयाग के अशोक स्तंभ पर हरिषेण द्वारा रचित समुद्रगुप्त का प्रशस्ति लेख उत्कीर्ण है।
- o काशी का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है। महाभारत के अनुसार इस नगर की स्थापना दिवोदास ने की थी। काशी महाजनपद की राजधानी वाराणसी थी।
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एटा
जिले के 'कंटिगरा'
गांव से ईसा पूर्व 200 से 600 ईस्वी काल के उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- o गढ़वा (प्रयागराज) से कुमारगुप्त प्रथम के दो शिलालेख तथा स्कंदगुप्त का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है।
- o गढ़वा (प्रयागराज) से कुमारगुप्त प्रथम के दो शिलालेख तथा स्कंदगुप्त का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है।
- o भितरी स्तंभ लेख (गाजीपुर) में पुष्यमित्रों और हूणों के साथ स्कंदगुप्त के युद्ध का वर्णन है।
- o 1194 ई. में चंदावर के युद्ध में मुहम्मद गोरी ने गहड़वाल नरेश जयचंद (कन्नौज का शासक) को पराजित किया था।
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देवगढ़ (ललितपुर जिला) से प्राप्त
पुरातात्विक साक्ष्यों से गुप्तकाल के विशेष स्थापत्य एवं मूर्तिकला के साक्ष्य
मिले हैं। यहां के गुप्तकालीन मंदिरों में दशावतार मंदिर उल्लेखनीय है। दशावतार
मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें बारह मीटर ऊंचा एक शिखर है, जो भारतीय मंदिर निर्माण में शिखर का संभवतः पहला उदाहरण है। जहां अन्य
मंदिरों में केवल एक मंडप होता था, उसके विपरीत इसमें चार
मंडप हैं।
- o हर्षवर्द्धन प्रति पांचवें वर्ष प्रयाग में महामोक्ष परिषद का आयोजन करता था।
- o
हर्षवर्द्धन
का 628 ई. का ताम्र दानपत्र लेख बांसखेड़ा से प्राप्त हुआ है। यह ब्राह्मी लिपि
तथा संस्कृत भाषा में लिखा गया है, जिसमें हर्ष की वंशावली, प्रशासनिक संरचना एवं सैनिक
अभियान का उल्लेख है। इस अभिलेख में हर्षवर्द्धन द्वारा अहिच्छत्र भुक्ति के
मर्कटसागर गांव को कर-मुक्त करके दो ब्राह्मणों को दान में देने का उल्लेख प्राप्त
होता है।

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